Aankh se aankh milaa baat banaata kyooN hai/ आँख से आँख मिला बात बनाता क्यूँ है
आँख से आँख मिला बात बनाता क्यूँ है
तू अगर मुझसे ख़फ़ा है तो छुपाता क्यूँ है
ग़ैर लगता है न अपनों की तरह मिलता है
तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है
वक़्त के साथ ख़यालात बदल जाते हैं
ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है
एक मुद्दत से जहां काफ़िले गुज़रे ही नहीं
ऐसी राहों पे चराग़ों को जलाता क्यूँ है
-सईद राही
Socha nahin achcha bura/ सोचा नहीं अच्छा–बुरा
सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं,
माँगा ख़ुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं
देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात-भर
भेजा वही कागज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं
इक शाम की दहलीज़ पर, बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं
-बशीर बद्र
Kabhi to khul ke baras/ कभी तो खुल के बरस
कभी तो खुल के बरस अब्र-ए-मेहरबाँ की तरह,
मेरा वजूद है जलते हुए मकाँ की तरह
(अब्र-ए-मेहरबाँ = मेहरबान बादल), (वजूद = आस्तित्व)
मैं इक ख़्वाब सही आपकी अमानत हूँ,
मुझे संभाल के रखियेगा जिस्म-ओ-जाँ की तरह
(अमानत = धरोहर)
कभी तो सोच के वो शख़्स किस कदर था बुलंद,
जो बिछ गया तेरे क़दमों में आस्माँ की तरह
बुला रहा है मुझे फिर किसी बदन का बसंत,
गुज़र न जाए ये रुत भी कहीं ख़िज़ाँ की तरह
(ख़िज़ाँ = पतझड़)
-प्रेम वरबाटोनी
Tere khushboo mai basey khat/ तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त
तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
जिन को दुनिया की निगाहों से छुपाये रक्खा
जिन को इक उम्र कलेजे से लगाये रक्खा
दीन जिन को, जिन्हें ईमान बनाये रक्खा
जिन का हर लफ़्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझ को जो पैग़ामे -ज़ुबानी की तरह
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिक्खे
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिक्खे
कभी दिन में तो कभी रात को उठ कर लिक्खे
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुये पानी में लगा आया हूं
-राजेन्द्र नाथ ‘रहबर’
Aye Khuda Ret Ke Sehra Ko/ ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को
ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे,
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे
(सहरा = रेगिस्तान)
तुझ को देखा नही, महसूस किया है मैंने,
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर कर दे
(पैकर = चेहरा, मुख)
और कुछ भी मुझे दरकार नही है लेकिन,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
(दरकार = वांछित, अपेक्षित)
-शाहिद मीर
Ye to nahin ke gham nahin\ ये तो नहीं के ग़म नहीं
ये तो नहीं के ग़म नहीं,
हाँ मेरी आँख नम नहीं
तुम भी तो तुम नहीं हो आज,
हम भी तो आज हम नहीं
अब न ख़ुशी की है ख़ुशी,
ग़म का भी अब तो ग़म नही
मौत अगरचे मौत है,
मौत से ज़ीस्त कम नहीं
(अगरचे = यद्यपि, हालाँकि), (ज़ीस्त = जीवन)
– फ़िराक़ गोरखपुरी
Kabhi guncha kabhi shola/ कभी गुंचा कभी शोला
कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह,
लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह
[(गुंचा = कली), (शबनम = ओस)]
मेरे महबूब मेरे प्यार को इल्ज़ाम न दे,
हिज्र में ईद मनाई है, मुहर्रम की तरह
(हिज्र = बिछोह, जुदाई)
मैंने ख़ुशबू की तरह तुझको किया है महसूस,
दिल ने छेड़ा है तेरी याद को, शबनम की तरह
कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है,
दिल पे नश्तर भी लगाते हो तो मरहम की तरह
(नश्तर= शल्य क्रिया/ चीर-फाड़ करने वाला छोटा चाकू)
-राणा सहरी