Tumhari Anjuman Se/ तुम्हारी अंजुमन से
तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते
(अंजुमन = सभा, महफ़िल), (वाबस्ता = सम्बन्धित, सम्बद्ध, बंधा हुआ)
तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमानें कहाँ जाते
(बादा-ख़ाना = मदिरालय)
चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
(वगरना = नहीं तो)
निकल करा दैरो काबा से अगर मिलता ना मैख़ाना
तो ठुकराये हुये इन्सान ख़ुदा जाने कहाँ जाते
(दैरो काबा = मंदिर और मस्जिद)
-क़तील शिफ़ाई
Pahle to apne dil kee razaa jaan jaaiye/ पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइए
पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइए
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइए
(रज़ा = मर्ज़ी, इच्छा)
पहले मिजाज़-ए-राहगुजर जान जाइए
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइए
(मिजाज़-ए-राहगुजर = रास्ते का स्वाभाव/ प्रकृति), (गर्द-ए-राह = रास्ते की धूल)
कुछ कह रहीं हैं आपके सीने की धड़कनें
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइए
इक धूप सी जमी है निगाहों के आसपास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइए
शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झांककर हमें पहचान जाइए
(निस्बत = सम्बन्ध, लगाव, ताल्लुक)
– क़तील शिफ़ाई
Sadma to Hai Mujhe Bhi/ सदमा तो है मुझे भी
सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं
बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूँडता हूँ मैं
(वजूद = आस्तित्व, मौजूदगी)
क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं
ले मेरे तजुर्बों से सबक़ ऐ मेरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं
(रक़ीब = प्रतिद्वंदी)
-क़तील शिफ़ाई
Angdai Par Angdai Leti Hai Raat Judai Ki/ अँगड़ाई पर अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की
अँगड़ाई पर अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानों बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैनें आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
(हरजाई = दुश्चरित्र)
वस्ल की रात ने जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए, तारों ने बड़ी दानाई की
(वस्ल = मिलन), (इसरार = आग्रह, हठ), (दानाई = अक्लमंदी, बुद्धिमत्ता)
उड़ते उड़ते आस का पँछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते रोते बैठ गयी आवाज़ किसी सौदाई की
(उफ़क़ = क्षितिज), (सौदाई = पागल, बावला)
-क़तील शिफ़ाई
Pareshan raat sari hai/ परेशाँ रात सारी है
परेशाँ रात सारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूते-मर्ग तारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
(सुकूते-मर्ग = मौत की ख़ामोशी), (तारी = आ घेरना, छाना)
तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ
कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जा
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
(शब = रात)
हमें भी नींद आ जाएगी, हम भी सो ही जाऐंगे
अभी कुछ बेक़रारी है, सितारों तुम तो सो जाओ
-क़तील शिफ़ाई
इसी ग़ज़ल का एक और शेर:
हँसो और हँसते-हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ
(ख़लाओं में = शून्य में)
Apne HaathoN Kee LakiroN/ अपने हाथों की लकीरों
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।
ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।
बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।
(बादा = शराब)
-क़तील शिफ़ाई
Dil Ko Gham-e-Hayaat/ दिल को ग़म–ए–हयात
दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों
पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों
[(ग़म-ए-हयात = जीवन का दुःख), (गवारा = रुचिकर, पसंदीदा), (चारा = उपाय, तदबीर, तरकीब)]
ये दिल, ज़रा सा दिल, तेरी यादों में खो गया
ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों
(ज़र्रा = बहुत छोटा टुकड़ा या खंड, अणु, कण)
तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी
अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों
(शब = रात)
-क़तील शिफ़ाई
Milkar Juda Huye To Na Soya Karenge Hum/ मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम
आँसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम
जब दूरियों की याद दिलों को जलायेगी,
जिस्मों को चांदनी में भिगोया करेंगे हम
गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी ‘क़तील’
साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम
(साहिल = किनारा)
-क़तील शिफ़ाई
Ye mojeza bhi mohabbat/ ये मोजज़ा भी मुहब्बत
ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे
(मोजज़ा =चमत्कार), (संग = पत्थर)
वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे
(बदगुमाँ = जिसके मन में किसी के प्रति सन्देह उत्पन्न हुआ हो)
वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे
मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ “क़तील”
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे
(ग़म-ए-हयात = जीवन का दुःख)
-क़तील शिफ़ाई