A Journey

 

Pyaar mujh se jo kiyaa tumne to kya paaogi/ प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी

प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आँधी में, बिखर जाओगी

रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिंदा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िंदा हूँ
ख़्वाब क्यों देखूँ वो कल जिस पे मैं शरमिंदा हूँ
मैं जो शरमिंदा हुआ, तुम भी तो शरमाओगी

क्यों मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुम पे तो आसान रहे
हमसफ़र मुझ को बनाओगी तो पछताओगी

एक मैं क्या अभी आएँगे दीवाने कितने
अभी गूँजेंगे मोहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनाएगी फ़साने कितने
क्यों समझती हो मुझे भूल नहीं पाओगी

-जावेद अख़्तर

Tum itna jo muskura rahe ho/ तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो

आँखों में नमी, हँसी लबों पर
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते
ये अश्क जो पीते जा रहे हो

(अश्क = आँसू)

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो

-कैफ़ी आज़मी

Kis ko aati hai masihaayee kise aawaaz doon/ किसको आती है मसीहाई किसे आवाज़ दूँ

किसको आती है मसीहाई किसे आवाज़ दूँ
बोल ऐ खूँख़ार तन्हाई किसे आवाज़ दूँ

चुप रहूँ तो हर नफ़स डसता है नागन की तरह
आह भरने में है रुसवाई किसे आवाज़ दूँ

(नफ़स = साँस), (रुसवाई = बदनामी)

उफ़ ख़ामोशी की ये आहें दिल को भरमाती हुई
उफ़ ये सन्नाटे की शहनाई किसे आवाज़ दूँ

-जोश मलीहाबादी

Thukarao ab ke pyar karo main nashe mein hoon/ ठुकराओ अब, के प्यार करो, मैं नशे में हूँ

ठुकराओ अब, के प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ऐ-वफ़ा मगर
मेरा ना एतबार करो, मैं नशे में हूँ

(यक़ीन-ऐ-वफ़ा = वफ़ा का भरोसा)

गिरने दो तुम मुझे, मेरा साग़र संभाल लो
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ

(साग़र = शराब का प्याला)

मुझको क़दम-क़दम पे भटकने दो वाइज़ों
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ

(वाइज़ = धर्मोपदेशक),

फ़िर बेख़ुदी में हद से गुज़रने लगा हूँ मैं
इतना ना मुझसे प्यार करो, मैं नशे में हूँ

(बेख़ुदी = बेख़बरी, आत्मविस्मृति)

-शाहिद कबीर

इसी ग़ज़ल के कुछ और अश’आर:

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ
जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

(इख़्तियार = अधिकार, काबू, प्रभुत्व), (अहल-ए-कारवाँ = कारवाँ वालों)

अपनी जिसे नहीं उसे ‘शाहिद’ की क्या ख़बर
तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

Ab main ration ki qataaron mein nazar aata hoon/ अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ

अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ

इतनी महंगाई के बाज़ार से कुछ लाता हूँ
अपने बच्चों में उसे बाँट के शरमाता हूँ

अपनी नींदों का लहू पोंछने की कोशिश में
जागते जागते थक जाता हूँ सो जाता हूँ

कोई चादर समझ के खींच ना ले फिर से ‘ख़लील’
मैं कफ़न ओढ़ के फुटपाथ पे सो जाता हूँ

-ख़लील धनतेजवी

Apni marzi se kahan apne safar ke hum hain/ अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं

(आलम = दशा, हालत)

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं

(राहगुज़र = रास्ता, मार्ग, सड़क)

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं

-निदा फ़ाज़ली

Patthar ke khuda patthar ke sanam/ पत्‍थर के ख़ुदा पत्‍थर के सनम

पत्‍थर के ख़ुदा पत्‍थर के सनम पत्‍थर के ही इंसाँ पाए हैं
तुम शहर-ए-मुहब्‍बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं

बुतख़ाना समझते हो जिसको पूछो ना वहाँ क्‍या हालत हैं
हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं

हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ
सहरा में खु़शी के फूल नहीं, शहरों में ग़मों के साए हैं

(सहरा = जंगल, रेगिस्तान)

होठों पे तबस्‍सुम हल्‍का-सा आंखों में नमी सी ऐ ‘फ़ाकिर’
हम अहल-ए-मुहब्‍बत पर अकसर ऐसे भी ज़माने आए हैं

(तबस्‍सुम = मुस्कराहट), (अहल-ए-मुहब्‍बत = मुहब्बत करने वाले लोग)

-सुदर्शन फ़ाकिर

Jaate jaate wo mujhe achchhi nishaani de gayaa/ जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया

उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बराए मेहरबानी दे गया

(बराए मेहरबानी = मेहरबानी  के वास्ते, मेहरबानी के लिए)

सब हवाएँ ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया

(कश्ती बादबानी = पाल वाली नाव )

ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उसने इतना तो किया
मेरी पलकों की क़तारों को वो पानी दे गया

-जावेद अख़्तर

Hazaaron khwahishain aisi/ हज़ारों ख़वाहिशें ऐसी

हज़ारों ख़वाहिशें ऐसी, कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

(ख़्वाहिश = इच्छा, अभिलाषा)

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं, लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

(ख़ुल्द = स्वर्ग, जन्नत), (आदम = सबसे पहला मनुष्य)

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफ़िर पे दम निकले

(काफ़िर = ईश्वर को ना मानने वाला, यहाँ प्रेमिका के लिए इस्तेमाल किया है)

कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा, ग़ालिब. और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था, कि हम निकले

(वाइज़ = धर्मोपदेशक)

-मिर्ज़ा ग़ालिब 

ख़ुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा ज़ालिम 
कहीं ऐसा ना हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले 

-बहादुर शाह ज़फ़र 

Kal chaudhvin ki raat thi/ कल चौदहवीं की रात थी

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

(शब = रात)

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंजूर था परदा तेरा

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा

(कूचा = गली), (सहरा = रेगिस्तान)

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा

(रुसवा = अपमानित, बदनाम)

-इब्ने इन्शा

Der lagi aane mein tumko shukr hai fir bhi aaye to/ देर लगी आने में तुमको शुक्र है फिर भी आये तो

देर लगी आने में तुमको शुक्र है फिर भी आये तो
आस ने दिल का साथ न छोड़ा वैसे हम घबराए तो

शफ़क़, धनुक, महताब, घटाएँ, तारे, नग़मे, बिजली, फूल
उस दामन में क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो

(शफ़क़ = किरणे, सवेरे या शाम की लालिमा जो क्षितिज पर होती है), (धनुक = इन्द्रधनुष), (महताब = चन्द्रमा)

झूठ है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा ख्व़ाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो

सुनी सुनाई बात नहीं है अपने ऊपर बीती है
फूल निकलते हैं शोलों से चाहत आग लगाए तो

-अन्दलीब शादानी


इसी ग़ज़ल के कुछ और अश’आर:

यूँ ही बे-समझे बूझे तुमने गेसू लहराये तो
कोई इस तूफ़ान-ए-बला में दीवाना हो जाए तो

(गेसू = बाल, ज़ुल्फ़ें)

अब्र,शफ़क़,महताब,सितारे,बिजली,नगमे,शबनम,फूल
उस दामन में क्या कुछ है,हाथ वो दामन आए तो

(अब्र = बादल), (शबनम = ओस)

चाहत के बदले में हम तो बेच दे अपनी मर्ज़ी तक
कोई मिले तो दिल का ग्राहक कोई हमें अपनाए तो

औरो की रूदाद नहीं है अपने ऊपर बीती है
फूल निकलते है शोलों से चाहत आग लगाए तो

(रूदाद = समाचार, वृतांत, दशा, विवरण)

नादानी और मजबूरी में कुछ तो यारों फ़र्क करो,
एक बेबस इन्सान करे क्या टूट के दिल आ जाए तो

अपनी बर्बादी का तन्हा एक हमी को रंज नहीं,
अपने किये पर आखिर आखिर वो भी कुछ पछताये तो

रूसवाई के घर से कोई राज़-ए-मोहब्बत छुपता है
आहें रोकी, आँसू रोके, रंज मगर उड़ जाये तो

Tum nahi gham nahi sharaab nahi/ तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं
ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं

गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं

(गाहे-गाहे = कभी कभी)

जिसको तूने न आज़माया हो
वो कहीं पर भी कामयाब नहीं

जाने किस किस की मौत आयी है
आज रुख़ पे कोई नक़ाब नहीं

वो करम उँगलियों पे गिनते हैं
ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं

जो क़यामत न ढा सके ‘राही’
वो किसी काम का शबाब नहीं

-सईद राही

Tujhse milne ki saza denge tere shehar ke log/ तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग

तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग

क्या ख़बर थी तेरे मिलने पे क़यामत होगी
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग

तेरी नज़रों से गिराने के लिए जान-ए-हया
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग

कह के दीवाना मुझे मार रहें हैं पत्थर
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग

-दानिश अलीगढ़ी

Apni aankhon ke samandar main utar jaane de/ अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे

(माज़ी = भूतकाल, बीता हुआ समय)

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ के कहूँ तुझसे मगर जाने दे

ज़िंदगी मैं ने इसे कैसे पिरोया था न सोच 

हार टूटा है तो मोती भी बिखर जाने दे 

इन अँधेरों से ही सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर’ 

रात के साए ज़रा और निखर जाने दे 



-नज़ीर बाकरी

Meri zindagi kisi aur ki/ मेरी ज़िन्दगी किसी और की

मेरी ज़िन्दगी किसी और की, मेरे नाम का कोई और है
मेरा अक्स है सर-ए-आईना, पस-ए-आइना कोई और है

(सर-ए-आईना = आईने के सामने), (अक्स = प्रतिबिम्ब, परछाई), (पस-ए-आइना = आईने के पीछे)

मेरी धड़कनों में है चाप सी, ये जुदाई भी है मिलाप सी
मुझे क्या पता, मेरे दिल बता, मेरे साथ क्या कोई और है

(चाप = तेज़ आवाज़)

न गए दिनों को ख़बर मेरी, न शरीक-ए-हाल नज़र तेरी
तेरे देस में, मेरे भेस में, कोई और था कोई और है

(शरीक-ए-हाल = संगी, साथी, हर अवस्था में साथ रहनेवाला)

वो मेरी तरफ़ निगराँ रहे, मेरा ध्यान जाने कहाँ रहे
मेरी आँख में कई सूरतें, मुझे चाहता कोई और है

(निगराँ = १) निरीक्षक, जाँच-पड़ताल करने वाला, २) संरक्षक, देख-रेख करने वाला, ३) प्रतीक्षातुर, रास्ता देखने वाला)

-मुज़फ़्फ़र वारसी


न मकाम का, न पड़ाव का, ये हयात नाम बहाव का
मिरी आरज़ू न पुकार तू, मिरा रास्ता कोई और है

(हयात = जीवन)

Tere khushboo mai basey khat/ तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त

तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे 
प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे 
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे 

जिन को दुनिया की निगाहों से छुपाये रक्खा 
जिन को इक उम्र कलेजे से लगाये रक्खा 
दीन जिन को, जिन्हें ईमान बनाये रक्खा 

जिन का हर लफ़्ज़ मुझे याद था पानी की तरह 
याद थे मुझ को जो पैग़ामे -ज़ुबानी की तरह 
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह 

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिक्खे 
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिक्खे 
कभी दिन में तो कभी रात को उठ कर लिक्खे 

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूं 
आग बहते हुये पानी में लगा आया हूं 

-राजेन्द्र नाथ ‘रहबर’

Aye Khuda Ret Ke Sehra Ko/ ख़ुदा रेत के सहरा को

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे,
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे

(सहरा = रेगिस्तान)

तुझ को देखा नही, महसूस किया है मैंने,
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर कर दे

(पैकर = चेहरा, मुख)

और कुछ भी मुझे दरकार नही है लेकिन,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे

(दरकार = वांछित, अपेक्षित)

-शाहिद मीर

इसी ग़ज़ल के कुछ और अ श’आर:

दिल लुभाते हुए ख़्वाबों से कहीं बेहतर है,
एक आँसू कि जो आँखों को मुनव्वर कर दे

 (मुनव्वर = प्रकाशमान, प्रज्ज्वलित)

क़ैद होने से रहीं नींद की चंचल परियाँ,
चाहे जितना भी ग़िलाफ़ों को मोअत्तर कर दे

(मोअत्तर = सुगंधित, महकदार, ख़ुशबूदार)

Huzoor aapka bhi ahtraam karta chaloon/ हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूँ

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूँ
इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ

(एह्तराम = आदर, सम्मान)

निगाह-ओ-दिल की यही आख़री तमन्ना है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम करता चलूँ

(निगाह-ओ-दिल = नज़रें और दिल)

उन्हे ये ज़िद के मुझे देखकर किसी को ना देख
मेरा ये शौक के सबसे कलाम करता चलूँ

(कलाम = बातचीत)

ये मेरे ख़्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन
अब आ गया हूँ तो दो दिन क़याम करता चलूँ

(क़याम = ठिकाना, ठहराव, ठहरने की जगह, विश्राम-स्थल)

Sadma to Hai Mujhe Bhi/ सदमा तो है मुझे भी

सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं

बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूँडता हूँ मैं

(वजूद = आस्तित्व, मौजूदगी)

क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं

ले मेरे तजुर्बों से सबक़ ऐ मेरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं

(रक़ीब = प्रतिद्वंदी)

-क़तील शिफ़ाई

Apne HaathoN Kee LakiroN/ अपने हाथों की लकीरों

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।

(बादा = शराब)

-क़तील शिफ़ाई